भारत दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देशों में से एक है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में एक रोचक और गंभीर प्रवृत्ति सामने आई है — लाखों भारतीय अपनी नागरिकता छोड़ रहे हैं, जबकि बहुत कम विदेशी नागरिक भारत की नागरिकता ले रहे हैं। यह सवाल अब अक्सर पूछा जाने लगा है कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? इस लेख में हम निष्पक्ष रूप से (बिना किसी राजनीतिक पक्षपात के) इस पूरी स्थिति का विश्लेषण करेंगे।

भाग 1: भारतीय नागरिकता छोड़ने वाले लोगों की स्थिति (2014–2025)

भारत के विदेश मंत्रालय (MEA) और संसद में दी गई जानकारी के अनुसार, वर्ष 2014 से लेकर 2025 (अक्टूबर तक) तक लगभग 19–20 लाख भारतीय नागरिक अपनी नागरिकता छोड़ चुके हैं। यह संख्या बहुत बड़ी है और हर साल इसमें निरंतर वृद्धि देखी गई है। नीचे दी गई तालिका वर्षों के अनुसार नागरिकता छोड़ने वालों की अनुमानित संख्या दिखाती है।
वर्ष नागरिकता छोड़ने वाले भारतीयों की संख्या
2014 1,29,328
2015 1,31,489
2016 1,41,603
2017 1,33,049
2018 1,34,561
2019 1,44,017
2020 85,256
2021 1,63,370
2022 2,25,620
2023 2,16,219
2024 2,06,378
अगर इन सभी वर्षों को मिलाया जाए तो भारत ने पिछले दशक में करीब 20 लाख नागरिक

भाग 2: विदेशी नागरिकों द्वारा भारतीय नागरिकता प्राप्त करने की स्थिति

अब इसके विपरीत स्थिति देखें तो, बहुत कम विदेशी नागरिक भारत की नागरिकता प्राप्त करते हैं। भारत में नागरिकता प्राप्त करने की प्रक्रिया लंबी और जटिल है, और भारत दोहरी नागरिकता (Dual Citizenship) की अनुमति नहीं देता। इसलिए कोई भी विदेशी नागरिक अगर भारतीय नागरिक बनना चाहता है तो उसे अपनी पुरानी नागरिकता छोड़नी पड़ती है।
वर्ष भारतीय नागरिकता प्राप्त करने वाले विदेशी नागरिकों की संख्या
2017 817
2018 628
2019 987
2020 639
2021 1,773
यदि इन आंकड़ों को जोड़ा जाए तो 2014 से 2024 तक कुल मिलाकर लगभग 7,000–8,000 विदेशी नागरिकों

भाग 3: यह असमानता क्यों?

इस स्थिति के कई कारण हैं — आर्थिक, सामाजिक, प्रशासनिक और अंतरराष्ट्रीय। नीचे मुख्य कारणों की विस्तार से व्याख्या की गई है:
  • 1. उच्च कर दर और वित्तीय लचीलापन की कमी: भारत में उच्च आय वर्ग पर कर दर 30% तक जाती है। बहुत से धनवान भारतीय टैक्स प्लानिंग के लिए ऐसे देशों में बसना पसंद करते हैं जहाँ टैक्स कम है या नहीं है — जैसे दुबई, सिंगापुर, मोनाको आदि।
  • 2. वैश्विक अवसर और आसान यात्रा: पश्चिमी देशों की नागरिकता से 150 से अधिक देशों में वीजा-फ्री यात्रा की सुविधा मिलती है, जबकि भारतीय पासपोर्ट से यह संख्या लगभग 60 देशों तक सीमित है।
  • 3. बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य और जीवनशैली: उच्च वर्ग अपने बच्चों के लिए बेहतर शिक्षा और स्थिर वातावरण चाहता है। इसलिए अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया जैसे देश अधिक आकर्षक बनते हैं।
  • 4. राजनीतिक व प्रशासनिक कारण: कुछ लोगों को भारत की नौकरशाही और नीतिगत अनिश्चितता व्यवसाय या निवेश के लिए बाधा लगती है।
  • 5. वारिस योजना और सुरक्षा: परिवार की अगली पीढ़ी को सुरक्षित भविष्य देने के लिए कई लोग ‘दूसरी नागरिकता’ एक बीमा की तरह लेते हैं।

भाग 4: भारत में विदेशी नागरिकों की रुचि कम क्यों?

  • 1. दोहरी नागरिकता नहीं: भारत में केवल OCI (Overseas Citizen of India) कार्ड की सुविधा है, जो सीमित अधिकार देता है। इससे विदेशी नागरिक भारतीय नागरिक बनने में रुचि नहीं दिखाते।
  • 2. कर व्यवस्था जटिल: भारत का टैक्स और नियमावली ढांचा कई विदेशी निवेशकों को कठिन लगता है।
  • 3. सामाजिक और राजनीतिक अस्थिरता की धारणा: कुछ विदेशी नागरिक भारत की विविधता और जटिलता को लेकर सावधान रहते हैं।
  • 4. आर्थिक विकल्प: विदेशी निवेशकों के लिए नागरिकता लेने की जगह, सिर्फ व्यापार या निवेश के जरिए रहना अधिक व्यावहारिक होता है।

भाग 5: नागरिकता पलायन का अर्थव्यवस्था और समाज पर प्रभाव

नागरिकता पलायन केवल एक सांख्यिकीय डेटा नहीं है; इसका असर देश की अर्थव्यवस्था, समाज और वैश्विक छवि पर भी पड़ता है। जब उच्च आय और प्रतिभाशाली वर्ग विदेश जाता है, तो भारत को Brain Drain का नुकसान होता है। हालांकि, इसका एक सकारात्मक पहलू यह है कि प्रवासी भारतीय (NRIs) देश को रेमिटेंस यानी विदेशी मुद्रा भेजते हैं, जिससे अर्थव्यवस्था को मदद मिलती है। लेकिन अगर यह रुझान लंबे समय तक बढ़ता रहा, तो यह भारत के लिए चिंता का विषय हो सकता है, क्योंकि इससे प्रतिभा और नवाचार दोनों पर असर पड़ेगा।

भाग 6: क्या भारत को अपनी नागरिकता नीति बदलनी चाहिए?

यह एक जटिल लेकिन जरूरी सवाल है। भारत को शायद अपनी नागरिकता नीति पर फिर से विचार करना चाहिए — विशेष रूप से उन भारतीयों के लिए जो विदेश में बस चुके हैं लेकिन भारत से जुड़ाव रखना चाहते हैं। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि अगर भारत सीमित दोहरी नागरिकता की अनुमति दे, तो यह प्रवासी भारतीयों के लिए एक संतुलित विकल्प हो सकता है।

भाग 7: निष्पक्ष निष्कर्ष

अगर हम 2014 से लेकर 2025 (अक्टूबर तक) के आँकड़े देखें, तो साफ दिखता है कि भारत एक “Migration-Out” देश है, न कि “Migration-In” देश। यानी भारत से ज्यादा लोग बाहर जा रहे हैं, जबकि भारत में नागरिकता लेने वाले बहुत कम हैं। आँकड़ों के अनुसार: 2014–2025 के बीच लगभग 20 लाख भारतीय नागरिकता छोड़ चुके हैं, जबकि इसी अवधि में केवल 8,000 के करीब विदेशी भारतीय नागरिक बने हैं। यह अंतर दिखाता है कि भारत को प्रतिभा बनाए रखने और विदेशी नागरिकों को आकर्षित करने के लिए और प्रयास करने होंगे। नागरिकता का यह पलायन केवल आर्थिक या प्रशासनिक मुद्दा नहीं है — यह एक सामाजिक संकेत भी है कि भारत को अपने नागरिकों के लिए और बेहतर अवसर, सुरक्षा और विश्वास का माहौल बनाना होगा। तभी आने वाले वर्षों में यह अनुपात संतुलित हो पाएगा। लेखक की टिप्पणी: यह विश्लेषण पूरी तरह सार्वजनिक आँकड़ों और सरकारी रिपोर्टों पर आधारित है, किसी भी राजनीतिक दृष्टिकोण या विचारधारा से प्रभावित नहीं है।

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